सिंगरौली/देवसर। मध्य प्रदेश में पुलिस व्यवस्था को दुरुस्त करने की मंशा और सख्ती के लिए जाने जाने वाले पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना की छवि के बीच सिंगरौली जिले का जियावन थाना एक ऐसी कहानी का गवाह बना, जिसने सुशासन और सुरक्षा—दोनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। रेत के अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई में जब्त किया गया ट्रैक्टर (UP 64 AQ 4304) शनिवार 17 जनवरी की रात करीब 12 बजे—थाने के भीतर से ही रहस्यमय ढंग से गायब हो गया। जी हां, वही थाना, जहां सुरक्षा का भरोसा होता है; वहीं से रेत से भरा ट्रैक्टर “उड़नछू” हो गया। रोमांचक मोड़: थाने से गायब, फिर मजौना से बरामद घटना सामने आते ही जियावन पुलिस हरकत में आई। देर रात चली खोजबीन, दबिश और टीमवर्क के बाद ट्रैक्टर को मजौना क्षेत्र से बरामद कर पुनः जियावन थाना लाया गया। इस कार्रवाई को “सतर्कता और टीमवर्क” का उदाहरण बताया गया—लेकिन सवाल यह है कि जब्त वाहन थाने से बाहर कैसे निकला? रेत माफिया का नेटवर्क या ‘सहमति’ का खेल? यह मानना कठिन है कि थाने के भीतर से इतनी बड़ी मशीन बिना किसी की जानकारी, बिना किसी सहमति—और वो भी आधी रात—बाहर निकल जाए। इलाके में चर्चा है कि रेत माफिया का नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका है कि कानून की चौखट के भीतर भी उसके कदम पड़ जाते हैं। क्या यह केवल लापरवाही थी, या सिस्टम की मिलीभगत? जांच जारी है, लेकिन भरोसा डगमगाया है। सुशासन के दावे बनाम जमीनी हकीकत मुख्यमंत्री मोहन यादव हर मंच से सुशासन की सरकार का एलान करते हैं। मगर जियावन थाना क्षेत्र की यह घटना पूछती है—क्या नियम-कानून यहां लागू नहीं? थाना प्रभारी साहिबा और एसडीओपी गायत्री तिवारी के कार्यक्षेत्र में थाने के भीतर से वाहन का गायब होना, प्रशासनिक नियंत्रण और निगरानी पर सीधा प्रश्नचिह्न है। ‘शाबाशी’ या व्यंग्य? बरामदगी के लिए टीम को शाबाशी—बिल्कुल! लेकिन उससे पहले यह भी तय हो कि थाना ‘रेतखाना’ कैसे बन गया? जब कानून के रक्षक के परिसर से ही माफिया अपना माल निकाल ले, तो जनता किस पर भरोसा करे? अब असली परीक्षा ट्रैक्टर किसकी मदद से निकला? किस समय, किस गेट से, किस पहरे में चूक हुई? जिम्मेदारी तय होगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा? सीएम और डीजीपी तक पहुंचे—इतनी ‘दमदार’ कहानी यह खबर केवल एक ट्रैक्टर की नहीं, व्यवस्था की परीक्षा की है। यदि थाने के अंदर से रेत से भरा ट्रैक्टर रात 12 बजे गायब हो सकता है, तो यह कहना गलत नहीं कि जियावन थाना रेत माफियाओं के भरोसे चल रहा है—या चलाया जा रहा है। अब देखना यह है कि डीजीपी कैलाश मकवाना की सख्ती और सीएम मोहन यादव के सुशासन के दावे, जियावन तक कब और कैसे पहुंचते हैं। जनता जवाब चाहती है—और जवाबदेही भी।